Saturday, April 12, 2014

बुद्ध का धर्म

बुद्ध को समझने और उनके धर्म को जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि बुद्ध ने धर्म की खोज क्यों की और हमें इससे क्या लाभ मिलेगा। 

यह आज से हजारो वर्षों पूर्व की बात है। सिद्धार्थ अपने साथी चन्ना के साथ पहली बार नगर की सैर करने को निकले। तब उन्हे पहली बार रोग, बुढा़पा और मृत्यु के रूप में जीवन के दुःखों का ज्ञान हुआ। सिद्धार्थ ने देखा कि संसार के सारे प्राणी दुःखों से ग्रस्त हैं। उनके मन में सबके लिए करुणा जागी। तब उन्होने दुःखों के अंत और सुख की प्राप्ती की खोज का निर्णय किया। कई वर्षों की खोज के बाद उन्हे धर्म का ज्ञान हुआ और वह बुद्ध के नाम से जाने गए। उसके बाद उन्होने जीवन भर इस धर्म को खूब बांटा। कई वर्षों तक यह धर्म संसार के लोगों का कल्याण करता रहा। लेकिन यह धर्म इतना संवेदनशील है कि अगर इसको सही तरह से नहीं किया जाय या इसमे थोड़ी सा भी सम्मिश्रण  की जाय तो इससे लाभ नहीं मिलता। जब इससे लाभ नहीं मिलता तो लोग इसका अभ्यास करना बंद कर देते हैं और इस धर्म का ज्ञान धीरे धीरे समाप्त हो जाता है। समय समय पर लोगों ने इसमें सम्मिश्रण किया और बुद्ध के गुजर जाने के कुछ वर्षों बाद यह धर्म एक संप्रदाय बन गया। सौभाग्य से कुछ लोगों ने इसे अपने शुद्ध रूप में कायम रखा और आज यह धर्म अपने वास्तविक रूप में हमारे सामने है। 

सबसे पहले यह जानें कि धर्म का मतलब क्या है। धर्म का मतलब प्रकृति का नियम है। यह कोइ संप्रदाय नहीं और इसको समझने वाला और इसका पालन करने वाला बौद्ध नहीं बन जाता। धर्म का मतलब सुख और दुःख का संपूर्ण ज्ञान है। धर्म सब पर एक समान लागू होता है चाहे वह व्यक्ति किसी भी धार्मिक संप्रदाय का हो, किसी भी जाति का हो, किसी भी देश का हो या किसी भी योनी का हो। धर्म की साधना करने वाला एक वैज्ञानिक कि तरह अंतरमुखी होकर अपने भीतर की ओर देखता है और धर्म को समझने का प्रयत्न करता है। घटना बाहर होती है पर दुःख अंदर होता है - इसलिए अंतरमुखी होना पड़ता है।

अपने अंदर देखने के लिये मन का शांत और एकाग्र होना बहुत आवश्यक है। मन को एकाग्र करने के लिये प्राकृतिक सांस को तटस्थ भाव से देखना सहायक होता है। इस प्रकार समाधी का अभ्यास करने से मन सूष्म से सूष्म संवेदनाओं को देख सकता है। मन की संवेदनाओ को देखने के पीछे बहुत बड़ा कारण है।  

बुद्ध ने साधना करते समय शरीर में होने वाली संवेदनाओं की तरफ ध्यान दिया। उन्होने देखा कि जब जब शरीर और मन की इन्द्रियों पर स्पर्श होआ तब तब शरीर में संवेदना हुइ। तब मन इन संवेदनाओं पर राग और द्वेष की प्रतिक्रिया करने लगा। इस राग और द्वेष से दुःख उत्पन्न होआ। तब उन्होने सोचा कि क्या करने से दुःख उत्पन्न न हो। अब शरीर और इन्द्रियों का त्याग नहीं किया जा सकता और ऐसा करने से भी दुःख से मुक्ति नहीं मिल सकती। बाहरी घटनाओं पर मनुष्य का कोई वश नहीं है। मनुष्य के वश में केवल यह है कि वह इन संविदनाओं पर राग और द्वेश की प्रतिक्रिया करना बंद कर दे। बस यही सोचकर जब मन ने राग और द्वेष की प्रतिक्रिया नहीं की तब संवेदना कुछ देर में समाप्त हो गइ और दुःख उत्पन्न नहीं हुआ। जब मन ने राग और द्वेश की प्रतिक्रिया करना पूरी तरह बंद कर दिया तब भूतकाल के विकार मन में उभर कर सामने आये। राग और द्वेश जगाने के पुराने स्वभाव के कारण भूतकाल के विकार उभर कर आए। जब मन ने इन विकारों पर राग और द्वेष की प्रतिक्रिया नहीं की तो यह विकार समाप्त होने लगे। इस प्रकार जब सारे विकार समाप्त हो गये तब दुःखों से पूरी तरह मुक्ति मिली। 

बस यही धर्म का मूल सिद्धान्त है। बुद्ध ने इसी धर्म को चार आर्य सत्यों में समझाया। और इस रास्ते पर चलने के लिए आठ अंगो वाला आर्य मार्ग बताया।  

सुख की प्राप्ती के लिये दुःख का अंत जरूरी है। इसलिये यह चार आर्य सत्य दुःख के अंत पर जोर देते हैं। इन चार आर्य सत्य का मतलब है दुःख को पूरी तरह समझना, दुःख के कारण को पूरी तरह समझना, दुःख के अंत को पूरी तरह समझना और इन सत्यों को समझने और जानने की विधी को समझना।  

सबसे पहले यह जाने कि दुःख क्या है। असंतोष, रोग, दर्द, बुढ़ापा, मृत्यु, अनचाही घटना का होना और मनचाही वस्तु का अलग हो जाना - यह सब दुःख हैं। साधना करते हुए जब हम गहराई में जा कर देखते हैं तो पाते हैं कि वास्तव में शरीर और चित्त के प्रति आसक्ति या चिपकाव ही दुःख उत्पन्न करता है। 

इन सत्यों का ज्ञान पढ़ने से सुनने से सोचने से या मानने से नहीं हो सकता। इन्हे समझने के लिये आठ अंगो वाले आर्य मार्ग का अभ्यास करना होता है जो तीन भागों में बटे हैं - सही शील, सही समाधी और सही प्रज्ञा। 

सबसे पहले यह जानें कि शील का अभ्यास क्यों करना होता है। यह जानने के लिये यह समझें कि इस साधना का अंतिम लक्ष्य क्या है। इस साधना का अंतिम लक्ष्य मन को निर्विकार करना है और इस काम को करने में शील का पालन सहायक होता है।  

शील का मतलब सदाचार होता है। शील की साधना करने वाला एक संतुलित जीवन व्यापन करता है और अत्यधिक आमोद प्रमोद और कठोरता की अतियों से दूर रहता है। वह स्वयं के साथ और दूसरों के प्रति शांति उदारता और विनम्रता बनाए रखता है। वह स्वयं और दूसरों को हानि नहीं पहुंचाता। वह स्वयं और दूसरों के साथ निष्कपट व्यवहार करता है। उसके के मन में सभी प्राणियों के प्रति करुणा और मैत्री भाव होता है।  

सही समाधी का पालन करने वाला सजगकता और तटस्थता से प्राकृतिक सांस को देखकर मन को एकाग्र करता है 

प्रज्ञा का पालन रने वाला बहुत समझदारी से काम करता है। वह एकाग्र मन से शरीर और मन में होने वाली संवेदनाओं को तटस्थ भाव से देखता है और विकारों का त्याग करता है। वह हर पल सजग और सावधान रहता है। साधना में उसे जो भी प्रत्यक्ष अनुभव होते हैं वह उन्हे पूरी तरह समझता है। वह किसी भी बात को समझने से पहले उसकी पूरी तरह जांच करता है और उसे तब ही स्वीकार करता है जब वह उसका प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है। 

यह तीनों एक दूसरे के सहायक होते हैं। बिना सही शील और सही प्रज्ञा के सही समाधी की प्राप्ती नहीं हो सकती। सही शील और सही समाधी के बिना सही प्रज्ञा की प्राप्ती नहीं हो सकती। सही प्रज्ञा और सही समाधी के बिना सही शील की प्राप्ती नहीं हो सकती। 

बस इसी तरह काम करने से बुद्ध को बोधी की प्राप्ती हुइ। और इसी तरह काम करने से अनगिनत लोगों को दुःखों से राहत मिली और उन्होने एक अच्छा और संतुलित जीवन व्यतीत किया। इनमे से जिन लोगो ने दुःखों और विकारों का पूरी तरह अंत किया उन्हे भी बुद्ध की तरह बोधी की प्राप्ती हुइ। यदि  लोग आज भी इस धर्म को समझें और इसका अभ्यास करें तो उनका कल्याण होगा और समाज में शांति और मैत्री का वातावरण बनेगा। धर्म का पालन करने के लिए संसार का त्याग कर संयासी बनना जरूरी नहीं है। गृहस्थ जीवन यापन करते हुए भी धर्म का अभ्यास किया जा सकता है। धर्म का अभ्यास करने वाला एक सुखी और अच्छा जीवन व्यतीत करता है। 

इस लेख की यही कोशिश है कि लोग बुद्ध के धर्म को समझें और यदि हो सके तो इसका अभ्यास करने की कोशिश करें। 

सर्वमंगलम्। 

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