मन की सफाई से मेरा पहला परिचय बचपन के समय गोलमाल फिल्म (Golmaal, 1979) से हुआ। उस फिल्म में राम प्रसाद और भवानीशङ्कर बात कर रहे हैं।

राम प्रसाद — “पिताजी कहा करते थे कि छोटी छोटी गलतियों पर तो ध्यान देना ही नही चाहिये, मनुष्य को चाहिये मनुष्य की आत्मा में झांकने का प्रयास करे,क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात है — मन की सफाई।”भवानीशङ्कर — “भाई साहब ठीक कहते थे। आजकल के लोगों को देखो, दाढ़ी मूंछ साफ करने में लगे रहते हैं, और मन की सफाई की तरफ ध्यान ही नही देते।”
उस समय comedy में छुपी हुई गहरी बात समझ में नहीं आई।
उसी उम्र में स्कूल में रोज यह प्रार्थना गाया करते थे -
हमको मन कि शक्ति देना मन विजय करे।दूसरों कि जय से पहले खुद को जय करे॥
पर उस समय मुझे यह प्रार्थना एक daily routine लगती थी, और बात की गहराई समझ में नहीं आती थी।
स्कूल का जीवन खत्म होने के लगभग बीस साल बाद विपश्यना के दस दिन का शिविर लिया और उस शिविर के बाद प्रतिदिन सुबह शाम विपश्यना का अभ्यास किया। तब जाकर वास्तव में मन का अनुभव हुआ और तब जाना कि मन कि सफाई कैसे होती है और क्यों होती है।
जब मैं अंतर्मुखी होकर शरीर पर होने वाली संवेदनाओं (पुरानी भाषा में वेदना) का अनुभव करता हूं, उस समय मनचाही ना होने पर अगर मन में कोई विकार जागे, वह क्रोध हो भय हो या और कोई विकार हो, तब शरीर में एक दुःखद संवेदना का प्रवाह चल पड़ता है, मैं चाहता हूं कि यह संवेदना चली जाए पर वो जाती नहीं, मैं द्वेष (aversion) करता हूं और व्याकुल हो जाता हूं। व्याकुलतावश मेरा मन और प्रतिक्रिया करता है जिससे दुःखद संवेदना का संवर्धन (augmentation) होने लगता है और व्याकुलता बढ़ती जाती है। इसी तरह जब मनचाही हुई, तब शरीर में एक सुखद संवेदना का प्रवाह चल पड़ता है, मैं चाहता हूं कि यह संवेदना बनी रहे पर वो चली जाती है, मैं राग (craving) करता हूं और व्याकुल हो जाता हूं। अनचाही बार बार होती है, बार बार विकार जागते हैं, और बार बार मैं व्याकुल हो जाता हूं, क्योंकि मेरा व्याकुलता का स्वभाव है।
राग और द्वेष सिक्के के दो पहलू हैं, कोई भी जागे, वह व्याकुल करेगा ही। जब मैं प्रतिक्रिया करके राग द्वेश जगाता हूं उसका पहला शिकार मैं स्वयं हो जाता हूं और उसके बाद ही मैं किसी और की हानि करता हूं। जब मैं प्रतिक्रिया करके राग द्वेश जगाता हूं और उसका पहला शिकार मैं स्वयं हो जाता हूं, उसके बाद यह व्याकुलता मेरे तक ही सीमित नहीं रहती, वह चारों ओर फैलती है और सारा वातावरण व्याकुल हो जाता है। उस समय मेरे संपर्क में जो भी आए वह व्याकुल हो ही जाता है।
जब मैं प्रतिक्रिया नहीं करता और तटस्थ भाव से संवेदनाओं को देख कर समझता हूं कि यह अनित्य है, इसका उत्पाद होता है और व्यय हो जाता है, तब संवेदना के संवर्धन की प्रक्रिया रुकने लगती है, धीरे धीरे दुःखद संवेदना का बल कमजोर पड़ने लगता है, देर सवेर संवेदना का व्यय हो जाता है और मुझे विकारों से मुक्ति मिलती है।
जब मेरे मन में विकार नही जागते उस समय सारे शरीर में एक सुखद अनुभव होता है, बड़ी शान्ति महसूस होती है जो मेरे तक ही सीमित नहीं रहती। आसपास के सारे वातावरण में फैल जाती है।
यह किताबी ज्ञान नहीं है। किसी गुरुमहाराज नें कहा है इसलिये नहीं है। Philosophy वाला ज्ञान नहीं है। Intellectual या बौद्धिक ज्ञान नहीं है। यह मेरा अनुभव है इसलिये यह मेरी भावित प्रज्ञा है। क्योंकि यह ज्ञान मेरी वेदना से जागा है इसलिये यही मेरे लिये वेद है।
इसी को भारत की पुरानी भाषा में धर्म कहते थे। मन में जो भी जागे उसी को धर्म कहते थे। प्रकृति के नियम को धर्म कहते थे।
यह सरल शुद्ध सनातन सार्वजनिक धर्म है। जो सब पर समान रूप से लागू होता है। वह व्यक्ति चाहे किसी संप्रदाय (religion) का हो, किसी जाति का हो, कैसे भी कर्मकांड करने वाला हो, कैसी भी वेशभूषा रखता हो, आत्मा को मानने वाला हो या ना मानने वाला हो, परमात्मा को मानने वाला हो या ना मानने वाला हो, निर्धन हो या धनवान हो, अनपण हो या विद्वान हो, समझदार हो या नासमझ।
विकार जगाया है तो व्याकुल होगा ही। दुःखी होगा ही। दुनिया की कोई शक्ति उसे व्याकुलता से बचा नहीं सकती। और जब वह व्यक्ति विकार नहीं जगाता पर मैत्री जगाता है करुणा जगाता है। वह उसी क्षण सुखी हो जाता है। प्रकृति का यह बंधा-बंधाया नियम है।
धर्म की इतनी सीधी बात है। जिसके जितनी जल्दी समझ में आ जाती है वह उतनी जल्दी काम में लग जाता है। वह सांप्रदायिक बातों में नही उलझता कि यह हिन्दुओं की बात यह बौद्धों की बात। प्रकृति का नियम सब पर एक समान लागू होता है। धर्म सबका एक होता है।
धर्म की गहराइयों में ले जाने वाली और व्याकुलता के स्वभाव को बदलने वाली इस विद्या को विपश्यना कहते हैं। जिस प्रकार धर्म सार्वजनिक होता है उसी प्रकार यह विद्या भी सार्वजनिक है। इस विद्या का पहला पक्ष है कि हम मन की उन गहराईयों को देख सकें जहां विकारों का प्रजनन और संवर्धन होता है। दूसरा पक्ष है कि हम समता बनाए रखें और प्रतिक्रिया ना करें।
इस विद्या के तीन अङ्ग हैं -
- पहला — शील (morality)
मैं शरीर या वाणी से ऐसा कोई काम ना करुं जिससे मेरी या किसी और की हानि हो।
2. दूसरा — समाधि (concentration or stillness of the mind)
अपनी शुद्ध प्राकृतिक सांस के सहारे मन को एकाग्र करुं।
3. तीसरा — प्रज्ञा (purifying wisdom)
शरीर पर होने वाली संवेदनाओं के आधार पर मन को निर्मल करुं।
यह भारत की बहुत पुरानी विद्या है जो कई बार जागी और लुप्त हो गयी। २५०० साल पहले एक महापुरुष नें कठिन परिश्रम करके पुनः खोज निकाली और लोक कल्याण के लिये लोगों को बांटी। इस व्यक्ति ने कोई संप्रदाय नहीं खड़ा किया। दुर्भाग्यवश २००० साल पहले यह विद्या भारत से लुप्त हो गई।
अब यह मन को वश में करने वाली और निर्मल करने वाली विद्या भारत में फिर से जागी है। तो जितना हो सके इसका अभ्यास करके लाभ ले लें और मन विजय करें। जब स्वयं काम करेंगे तो संसार की सारी शक्तियां स्वयं ही मदद करने लगेंगी।
अत्त-दीपा विहरथअत्त सरणा अनञ्ञ सरणाधम्म-दीपा धम्म सरणा
अपने आप को द्वीप बनाकर रहो। अपनी शरण में जाओ। किसी अन्य कि शरण में कभी मत जाओ। धर्म का द्वीप बनाओ और धर्म की शरण में जाओ।
धारेतिति धम्मो
धारण करे तो ही धर्म है।
धर्म को समझें और जीवन में उतारें। बात की गहराई को समझें -
मनुष्य को चाहिये मनुष्य के मन में झांकने का प्रयास करे,क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात है — मन की सफाई।
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