२५०० साल पहले उत्तर भारत में प्राक्रित भाषा बोली जाती थी।
यह लोगों की जन भाषा थी।
प्राक्रित का मतलब natural language होता है।
इस भाषा में भगवान को भगवा कहते थे।
आज इश्वर को भगवान कहने लगे,
पर पुरानी भाषा में भगवान का मतलब होता था -
“भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो ति भगवा।”
जो व्यक्ति अपना सारा राग भग्न कर ले
सारा द्वेष भग्न कर ले
सारा मोह भग्न कर ले
वह भगवा कहलाता था।
राग का मतलब आसक्ति होता है चिपकाव होता है।
मन का वह स्वभाव जो कहता है -
प्रिय घटना चाहिये प्रिय व्यक्ति चाहिये प्रिय वस्तु चाहिये।
द्वेष का मतलब मन का वह स्वभाव जो कहता है -
अप्रिय घटना नहीं चाहिये अप्रिय व्यक्ति नहीं चाहिये अप्रिय वस्तु नहीं चाहिये।
मोह का मतलब अविद्या होता है।
अविद्या का मतलब यह नहीं कि स्कूल की पढ़ाई नहीं की
या कोई किताब नही पढ़ी या बुद्धी विलास नहीं किया।
अविद्या का मतलब यह कि अपना ज्ञान नहीं जागा है।
अंतर्मुखी होकर अपने शरीर पर होने वाली संवेदनाओं के अनुभव से
जो ज्ञान जागे उसे भारत की पुरानी भाषा में विद्या कहते थे।
भगवा के इसी अर्थ में बुद्ध को भगवा या भगवान कहते हैं।
आज भी भगवान के वस्त्र को भगवा वस्त्र कहते हैं
और भगवान के वस्त्र के रंग को भगवा रंग कहते हैं।

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