आज के भारत की हर भाषा में निर्वाण का अर्थ मृत्यु हो गया है।
पर यह अर्थ सही अर्थ नहीं है।
२५०० साल पहले उत्तर भारत में प्राक्रित भाषा बोली जाती थी।
यह लोगों की जन भाषा थी।
प्राक्रित का मतलब natural language होता है।
प्राक्रित भाषा में निर्वाण को निब्बान कहते हैं।
“वाण” या “बान” कहते हैं जलने को।
निब्बान — जलना खत्म हो गया, आग बुझ गयी।
२५०० साल पहले निब्बान आम शब्द था।
उस समय में दीपक बुझ जाए तो कहते थे दीपक निब्बान हो गया।
हर व्यक्ति को निब्बान का अर्थ पता था।
क्या जलना होता है -
राग की आग भीतर जल रही है,
द्वेश की आग जल रही है,
मोह की आग जल रही है,
क्रोध और अहंकार की आग जल रही है,
विकारों की आग जल रही है।
और यह आग बुझ जाय तो
इसी जीवन में निब्बान की अवस्था की अनुभूती होती है।
विपस्सना में शरीर पर होने वाली संवेदनाओं को तटस्थ भाव
से जानते हुए अंतर मन की गहराईयों से जब
विकारों को जड़ से उखाड़ देते हैं और मन का स्वभाव बदल देते हैं
और -
“खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं”
पुराने कर्म संस्कार नष्ट कर दिये
और नया कर्म संस्कार नहीं बनाते
और -
“विसंखार गतं चित्तं”
चित्त या मन संस्कारों से मुक्त है
तब -
“निब्बानं परमं सुखं”
तब इसी जीवन में ध्यान करते हुए
निर्वाण के परम सुख की अनुभूती होती है।
यही निर्वाण शब्द का सही अर्थ है।

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