जब मैं अंतर्मुखी होकर शरीर पर होने वाली संवेदनाओं (पुरानी भाषा में वेदना) का अनुभव करता हूं, उस समय मनचाही ना होने पर अगर मन में कोई विकार जागे, वह क्रोध हो भय हो या और कोई विकार हो, तब शरीर में एक दुःखद संवेदना का प्रवाह चल पड़ता है, मैं चाहता हूं कि यह संवेदना चली जाए पर वो जाती नहीं, मैं द्वेष (aversion) करता हूं और व्याकुल हो जाता हूं। व्याकुलतावश मेरा मन और प्रतिक्रिया करता है जिससे दुःखद संवेदना का संवर्धन (augmentation) होने लगता है और व्याकुलता बढ़ती जाती है। इसी तरह जब मनचाही हुई, तब शरीर में एक सुखद संवेदना का प्रवाह चल पड़ता है, मैं चाहता हूं कि यह संवेदना बनी रहे पर वो चली जाती है, मैं राग (craving) करता हूं और व्याकुल हो जाता हूं। अनचाही बार बार होती है, बार बार विकार जागते हैं, और बार बार मैं व्याकुल हो जाता हूं, क्योंकि मेरा व्याकुलता का स्वभाव है।
राग और द्वेष सिक्के के दो पहलू हैं, कोई भी जागे, वह व्याकुल करेगा ही। जब मैं प्रतिक्रिया करके राग द्वेश जगाता हूं उसका पहला शिकार मैं स्वयं हो जाता हूं और उसके बाद ही मैं किसी और की हानि करता हूं। जब मैं प्रतिक्रिया करके राग द्वेश जगाता हूं और उसका पहला शिकार मैं स्वयं हो जाता हूं, उसके बाद यह व्याकुलता मेरे तक ही सीमित नहीं रहती, वह चारों ओर फैलती है और सारा वातावरण व्याकुल हो जाता है। उस समय मेरे संपर्क में जो भी आए वह व्याकुल हो ही जाता है।
जब मैं प्रतिक्रिया नहीं करता और तटस्थ भाव से संवेदनाओं को देख कर समझता हूं कि यह अनित्य है, इसका उत्पाद होता है और व्यय हो जाता है, तब संवेदना के संवर्धन की प्रक्रिया रुकने लगती है, धीरे धीरे दुःखद संवेदना का बल कमजोर पड़ने लगता है, देर सवेर संवेदना का व्यय हो जाता है और मुझे विकारों से मुक्ति मिलती है।
जब मेरे मन में विकार नही जागते उस समय सारे शरीर में एक सुखद अनुभव होता है, बड़ी शान्ति महसूस होती है जो मेरे तक ही सीमित नहीं रहती। आसपास के सारे वातावरण में फैल जाती है।
यह किताबी ज्ञान नहीं है। किसी गुरुमहाराज नें कहा है इसलिये नहीं है। Philosophy वाला ज्ञान नहीं है। Intellectual या बौद्धिक ज्ञान नहीं है। यह मेरा अनुभव है इसलिये यह मेरी भावित प्रज्ञा है। क्योंकि यह ज्ञान मेरी वेदना से जागा है इसलिये यही मेरे लिये वेद है।
इसी को भारत की पुरानी भाषा में धर्म कहते थे। मन में जो भी जागे उसी को धर्म कहते थे। प्रकृति के नियम को धर्म कहते थे।
यह सरल शुद्ध सनातन सार्वजनिक धर्म है। जो सब पर समान रूप से लागू होता है। वह व्यक्ति चाहे किसी संप्रदाय (religion) का हो, किसी जाति का हो, कैसे भी कर्मकांड करने वाला हो, कैसी भी वेशभूषा रखता हो, आत्मा को मानने वाला हो या ना मानने वाला हो, परमात्मा को मानने वाला हो या ना मानने वाला हो, निर्धन हो या धनवान हो, अनपण हो या विद्वान हो, समझदार हो या नासमझ।
विकार जगाया है तो व्याकुल होगा ही। दुःखी होगा ही। दुनिया की कोई शक्ति उसे व्याकुलता से बचा नहीं सकती। और जब वह व्यक्ति विकार नहीं जगाता पर मैत्री जगाता है करुणा जगाता है। वह उसी क्षण सुखी हो जाता है। प्रकृति का यह बंधा-बंधाया नियम है।
धर्म की इतनी सीधी बात है। जिसके जितनी जल्दी समझ में आ जाती है वह उतनी जल्दी काम में लग जाता है। वह सांप्रदायिक बातों में नही उलझता कि यह हिन्दुओं की बात यह बौद्धों की बात। प्रकृति का नियम सब पर एक समान लागू होता है। धर्म सबका एक होता है।